हिमनद और हिमखंड: एक परिचय

सूरज की गर्मी से समुद्री क्षेत्रों में जल वाष्प बनकर उड़ता है। यह वाष्प ऊपर जाकर संघनन क्रिया से बादलों का रूप ले लेती है। यह आकाशीय बादल ऊपर उठकर ठंडी हवा से ठंडे होते हैं तो इस वाष्प रूपी संचित जल को वापस पृथ्वी पर भेज देते हैं। यह जल वापसी की क्रिया तीन भिन्न रूपों में होती है:

अ. बारिश (Rain): यह सबसे आम रूप है जल की बूंदों के रूप में नीचे आना, जिसे हम ‘बारिश’ कहते हैं।

आ. ओले (Hailstorm): कभी-कभी यह बूंदें नीचे तक आते-आते भी ठोस रह जाती हैं और बर्फ के छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में धरती पर गिरती हैं। इन्हें हम ‘ओला’ बोलते हैं। यह ओले ठोस बर्फ के होते हैं और चोट पहुंचा सकते हैं या फसल / सामान इत्यादि को नुकसान पहुँचा सकते हैं। नीचे गिरने के बाद यह ओले अपने आकार के अनुसार कुछ समय में गल कर बह जाते हैं।

इ. हिमपात (Snowfall): अधिक ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों में यह हिम (बर्फ का ही एक रूप) के रूप में गिरती है, जिसे हम ‘हिमपात’ बोलते हैं। यह हिम वायुमंडलीय वाष्प के ठंडे होने से बने हिम कणों (Snow Flakes) के गुच्छे की तरह होती है। यह बिल्कुल भुरभुरी होती है और किसी को चोट नहीं पँहुचाती है। यह केवल सर्दियों के दिनों में ही गिरती है, जब ठंड अधिक होती है। निचले पहाड़ी इलाकों में वातावरण की गर्मी से यह बहुत जल्दी गल कर बह जाती है। किंतु ऊपरी इलाकों में अत्यधिक सर्द मौसम होने से इसकी परत दर परत लगती जाती हैं। इसको सामान्यतः हम Glacier (ग्लेशियर) के नाम से जानते हैं। जब समुद्र किनारे के इसी ग्लेशियर के टुकड़े टूट कर समुद्र में बहने लगते हैं, तब हम इसको Iceberg (आइसबर्ग) बोलते हैं।

इस लेख में हम ग्लेशियर और आइसबर्ग के विभिन्न रूपों के बारे में विस्तार से समझेंगें।

हिमचादर (Ice-sheet):–

अत्यधिक सर्द क्षेत्रों में परत दर परत जमती यह बर्फ मोटी होती जाती है। यह क्रिया सैकड़ों या हजारों नहीं बल्कि लाखों-करोड़ों सालों से होती रही है। यह बर्फ एक फैली हुई चादर की तरह नजर आती है और इसे ही ‘हिमचादर’ कहते है। यह हिमचादरें आकार में बहुत बड़ी होती हैं। वर्तमान में हिमचादरें केवल अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड में ही पायी जाती हैं।

अंटार्कटिका की हिमचादर:–

अंटार्कटिका की हिमचादर लगभग सवा करोड़ वर्ग किलोमीटर के फैलाव के साथ पृथ्वी पर पाया जाने वाला बर्फ का सबसे बड़ा भण्डार है। यह बर्फ की चादर औसतन 2 किमी मोटी है। इसकी अधिकतम मोटाई तो 5 किमी से कुछ ही कम है। आम भाषा में इसे हम ध्रुवीय हिमनद या ध्रुवीय हिमानी भी कह लेते हैं। इसने अंटार्कटिका का लगभग 98% हिस्सा घेरा हुआ है और विश्व के लगभग 90% हिमनद इन चादरों में ही स्थित हैं। अंटार्कटिका में इस चादर को पार-अंटार्कटिक पर्वत (Trans-Atlantic Mountain) पूर्वी और दक्षिणी हिस्से में बांटता है। पूर्वी हिस्सा अत्यधिक बड़ा है और उसके नीचे की धरती समुद्रतल से ऊंची है। इसका पश्चिमी हिस्सा अपेक्षाकृत बहुत छोटा है और इसकी धरती कहीं-कहीं समुद्रतल से नीची ही नहीं बहुत नीची है। यदि वहाँ यह हिमचादर न होती तो वह क्षेत्र समुद्र होता।

हिमटोपी (Ice-cap):–

50 हजार वर्ग किमी से अधिक क्षेत्रफल के हिमाच्छादित भाग को हिमचादर कहते हैं। इस से कम क्षेत्रफल की इसी प्रकार की छोटी चादर हिमटोपी कहलाती है। हिमटोपियाँ आर्कटिक घेरे में पड़ने वाले देशों जैसे रूस, आइसलैंड, नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, कनाडा, ग्रीनलैंड तथा अंटार्कटिका के कुछ हिस्सों में मिलती हैं। चित्र में दिखाई गई हिमटोपी आइसलैंड की है।

हिमनद या हिमानी (Glacier):–

ध्रुवीय बर्फ से इतर जब यह बर्फ पहाड़ों के बीच जमा होती है तो हिमनद या हिमानी कहलाती है। जहाँ हिमचादर और हिमटोपी की बर्फ स्थिर होती है, हिमनद गतिशील होते हैं और यही इनके बीच का सबसे मुख्य अंतर भी होता है। इन्हें अल्पाइन या पर्वतीय हिमनद भी कहा जाता है। हिमनद अपने भार के कारण पर्वतीय ढलान पर प्राकृतिक रूप से प्रवाहित रहते हुए नीचे की ओर सरकते रहते हैं। जैसे-जैसे यह नीचे आते हैं, उष्णता बढ़ती है और इनका निचला हिस्सा पिघल कर धाराओं और नदियों का रूप लेने लगता है। पानी पहाड़ों की दरारों से अंदर ही अंदर भी रिसता है। एक ओर यह भू-जल (Ground Water) का स्तर बढ़ाने में सहायक होता है, दूसरी ओर इससे पहाड़ियाँ अंदर से खोखली होने लगती हैं। यही हिमस्खलन और चट्टानों के दरकने का कारण बनता है। पहाड़ पर स्थित वनस्पतियों की जड़ें पहाड़ों को जकड़ कर रखने में सहायक होती हैं और चट्टानों के दरकने को नियंत्रित कर सकती हैं। हिमालय क्षेत्र में हजारों हिमानियाँ हैं। भारत के कुछ मुख्य हिमनद सियाचिन, जो विश्व का सबसे ऊँचा युद्ध क्षेत्र भी है, पिण्डारी, गंगोत्री, केदारनाथ इत्यादि हैं। पृथ्वी पर मीठे पानी (fresh water) का अधिकांश भण्डार हिमचादरों और हिमनदों के रूप में ही जमा रहता है।

हिमचादर, हिमटोपी और हिमनद का बनना और पिघलना:–

हिमचादर, हिमटोपी और हिमनद ऊंचे क्षेत्रों में सर्दियों में होने वाले हिमपात से बनते हैं। जब हिमपात की तीव्रता उनके पिघलने की गति से ज्यादा होती है, तब इनका आकार बड़ा होता जाता है। इससे नीचे की चादरों पर दवाब बढ़ता है और वह अधिक सघन हो जाती हैं। किंतु वर्तमान में भूमंडलीय ऊष्मीकरण (Global Warming) के कारण इनके पिघलने की गति बहुत बढ़ गई है, जिसकी तुलना में हिमपात कम हो रहा है। अतः इनकी मोटाई और क्षेत्र लगातार घट रहे हैं, जिससे समुद्र तल ऊपर आ रहा है और समुद्र किनारे के द्वीपों और भूभाग के लिए अस्तित्व का खतरा पैदा हो गया है।

हिमचादर या हिमटोपी स्थिर होने के कारण भूमि की रक्षा करते हैं। किंतु हिमनदों में गति और निचले हिस्से में इनके पिघलने के कारण, यह अपने साथ-साथ चट्टानों के टुकड़े, पत्थर, वनस्पतियाँ इत्यादि भी प्रवाहित करा लेते हैं। यही नीचे आ कर पहाड़ी घाटियों का निर्माण करते हैं और इनके पत्थरों की आपसी रगड़, नदी के किनारों और तलहटी से टकराने एवं जल बहाव की तीव्रता के कारण भूमि का और अधिक क्षरण होता है। मैदानी इलाकों की नदियों से इसी रेत को निकाल कर सीमेंट के साथ निर्माण कार्य में प्रयोग किया जाता है।

लटकते हिमनद (Hanging Glacier):–

सामान्यतः हिमनद पर्वत की चोटी से तलहटी तक फैले रहते हैं। किंतु कुछ हिमनद, पर्वत के कटाव या उसकी सीधी ढलान के कारण, बीच में ही अचानक खत्म हो जाते हैं। ऐसे हिमनदों को लटकते हिमनद कहा जाता है।

हिमचट्टान (Ice-shelf):–

जब समुद्र के किनारे की किसी हिमचादर, हिमटोपी या हिमनद से कोई बड़ा हिस्सा अलग हो कर समुद्र में तैरने लगता है तब उसे हिमचट्टान कहते है। यह देखने में समुद्र में तैरते हुए बड़े तख्ते की तरह नजर आती है। इनकी तैरने की गति बहुत धीमी होती है। ऐसी हिम चट्टानें अंटार्कटिका, ग्रीनलैंड और कनाडा के समुद्रों में देखी जा सकती हैं। इन हिमचट्टानों की मोटाई 1 किमी तक भी हो सकती है। सामान्यतः बर्फ का 1/7 भाग पानी के ऊपर और 6/7 भाग अंदर रहता है। किंतु हिमचट्टानों का घनत्व अधिक होने की वजह से इनका 8/9 भाग तक पानी के अंदर छुपा हो सकता है।

हिमशैल या हिमखंड (Iceberg):–

जब हिमनद या हिमचट्टान से टूट कर बिखरे हुए टुकड़े खुले पानी की तरफ आ कर तैरने लगते हैं, तब हम इन्हें हिमशैल या हिमखंड के नाम से जानते हैं। यह अनियमित आकार में होते हैं। इनका आकार काफी बड़ा हो सकता है। समुद्री खारे पानी के उत्प्लावन बल (Buoyancy) के कारण इनका 1/6 से 1/10 भाग ही हमें ऊपर दिखाई देता है बाकी 5/6 से 9/10 भाग पानी के नीचे रहता है। इसी को देखकर कहावत का निर्माण हुआ है, ‘tip of an iceberg’ या ‘हिमशैल का शीर्ष’ जिसका मतलब होता है कि हमें जितना यथार्थ में दिख रहा है, उससे कहीं अधिक तथ्य या अर्थ हमारे लिए अदृश्य या अनजान है। यह हिमशैल समुद्री मार्ग से आवागमन के लिए एक बड़ा खतरा माने जाते हैं। टाइटैनिक दुर्घटना भी ऐसे ही एक हिमशैल के कारण हुई थी। माना जाता है कि वह हिमशैल एक लाख साल पुराना और 7.5 करोड़ टन का रहा होगा, जिसका दिखाई देता हिस्सा ही 50-100 फुट मोटा और 200-400 फुट लंबा था।

समुद्री बर्फ (Sea-Ice):–

आर्कटिक या उत्तरी ध्रुव एक समुद्री क्षेत्र है। किंतु यहाँ अत्यधिक सर्द मौसम के कारण समुद्र पर बर्फ की मोटी चादर जम जाती है। यह चादर ‘समुद्री बर्फ’ के नाम से जानी जाती है। यह तीन मीटर तक मोटी हो सकती है। अंटार्कटिका के समुद्र में जमने वाली ‘समुद्री बर्फ’ की मोटाई इससे कम होती है, किंतु घनत्व आर्कटिक समुद्री बर्फ से अधिक रहता है।

 

आशा है, यह लेख आपकी जानकारी बढ़ाने में सहायक होगा। अपने विचारों और सुझावों से हमें अवश्य ही अवगत कराएं। इसी से संबंधित एक वीडियो भी आप इस लिंक पर देख सकते हैं।

 

यद्यपि तथ्यों को जांच कर प्रयोग किया गया, तथापि इसको कहीं भी उद्धृत करने से पूर्व पाठकों को स्वतः इनको जांच लेना चाहिए और अपने विवेक के अनुसार चलना चाहिए।

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